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कर्मणा रक्ष्यते धर्मो, धर्मो रक्षति रक्षितः।
शुद्धकर्मसमायुक्तो, न कदाचिद् विनश्यति॥

अर्थ:
कर्म से धर्म की रक्षा होती है और रक्षित धर्म मनुष्य की रक्षा करता है।
जो शुद्ध कर्मों से युक्त है, उसका कभी नाश नहीं होता।

यदा कर्माणि धर्म्याणि, तदा धर्मः स्वयं स्थितः।
न रक्षणं प्रयत्नेन, धर्मो रक्षति मानवम्॥

अर्थ:
जब कर्म धर्मयुक्त होते हैं, तब धर्म स्वयं स्थित हो जाता है।
तब मनुष्य को धर्म की रक्षा हेतु अलग प्रयास नहीं करना पड़ता—
धर्म स्वयं उसकी रक्षा करता है।
न जन्मस्थानं न कुलं न धर्मः
कः किमस्मीति न तेन निर्णीयते॥

न जन्मना न वंशेन
कश्चित् कः इति ज्ञायते।
कर्मणा एव प्रजायन्ते
मनुष्याः श्रेष्ठतां गताः॥


न जन्मना कः भवति।
कर्मणा एव कः भवति॥

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